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| डॉ रविंद्र प्रसाद |
सभी धर्मों में अपने-अपने कुछ नियम हैं,अपनी मर्यादाएं हैं।धर्म की परिभाषा बदल कर यह कहते व करते आ रहें कि जो हमें अच्छा लगे वही हमारा धर्म है। और,यह पतन हमारे हिन्दुओं में हो रहा है।हमारे यहाँ षोडश/सोलह संस्कार हैं, जिसमें एक विवाह संस्कार है। इसके लिए कुछ नियम प्रतिपादित किए गये हैं :
(01) सगोत्र विवाह नहीं होता है।
(05) पिता की पाँच पीढ़ी/ सात पीढ़ी और माता की पाँच पीढ़ी/तीन पीढ़ी के अंदर विवाह वर्जित है।
अन्य धर्मों में दूध की वर्निका है। मौसी,फूआ आदि की संतानों के साथ विवाह होता है,यह इस्लाम धर्म में है। लेकिन,हमारा हिन्दू सनातन धर्म भी अब अछूता नहीं है। यह पतन का कारण है।ऐसे ही लोगों को हम विधर्मी कहते हैं, जो अपने धर्म के विपरीत चलता हो। बहुत विचित्र है कि जो मौसी है,वही सास भी बन रही है।जो फूआ है,वही गोतनी बन रही है। क्या समय है?अपने ही भाई-बहन में, अपने ही चाचा-भतीजी में,अपने ही मामा-भगिनी में विवाह की परम्परा बुद्धिजीवियों की सोच समाज को कहाँ ले जा रही है? हाय ! दुर्दशा है,दुर्भाग्य है,हमारे समाज का।
कितनी बिगड़ गयी परम्परा, कितना बिगड़ गया सम्बन्ध क्या कभी सोचा है,उन्होंने? जो बहु और सास का रिश्ता था,वे दोनों आपस के समधन बन गये।जो चाचा-भतीजी का रिश्ता था ,वह पति-पत्नी बन गये।पूरे परिवार का ही सम्बन्ध बिगड़ गया।वाह रे बिगाड़ कर भी अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। लानत है ऐसे परिवार और समाज पर। यदि यही उचित है ,तो सारे पुराने सम्बन्ध समाप्त कर नये सम्बन्ध बनायें।
अंधेर नगरी चौपट राजा।
टके सेर सब्जी टके सेर खाजा।
आगे आएं हिन्दुत्व को बचाएँ।धर्म नहीं तो कुछ नहीं।
इस सम्बन्ध को हम वर्णसंकर नहीं कह सकते,लेकिन इसे सम्बन्धसंकर कह सकते हैं। सम्बन्ध का दोगलापन। ऐसे सम्बन्ध को हम कह सकते हैं :---
पुत्रि अपावन किए कुल दोऊ।
दोष किसका ? क्या यह दोष संतानों का है? नहीं, कदापि नहीं। माता पिताओं का है,बुजुर्गों का है। उनके कर्मों का फल संतानों को भोगना पड़ता है,भोगना पड़ेगा।
क्या संदेश देकर जा रहे हो,किस धर्म की स्थापना करके जा रहे हो ? कभी सोचा ? नहीं ,तो अब आपके पास सोचने का वक्त नहीं है,क्योंकि आप अब अवसान की ओर चल रहे हैं, ढलान की ओर ढल रहे हैं।
ये विधर्मी धर्म के विपरीत चलने वाले,धर्म के दुश्मन हैं।धर्म को इन विधर्मियों से सदैव सावधान रहने की सलाह है। -- अस्तु !
प्रस्तुतकर्ता : रवीन्द्र प्रसाद

