गलतियां मनुष्यों से ही होती हैं। बच्चेबूढ़े -बूढ़े, छोटे-बड़े सभी जीवन में समय- समय पर गलतियां करते रहते हैं। दूसरों के गलतियों पर हम बहुत जल्दी उत्तेजित हो जातें हैं और उन्हें दंड देने को तत्पर रहते हैं। पर स्वयं अपनी गलतियों पर पर्दा डालते हैं। कहीं कोई हमें दण्डित न कर दे,इसके लिए बचने के हर संभव प्रयास करते हैं। इसमें सफल भी जातें हैं, यही कारन है की हम बार बार गलतियां करते रहते हैं और उनके आदि भी हो जाते हैं।
हमें स्वयं को गलतियों पर दण्डित करने का स्वभाव विकसित करना चाहिए। कोई दूसरा हमें दंड दे इससे पहले स्वयं खींचे,गाल थप्पड़ लगाएं और अपने को डांटे मुर्ख हो जो ऐसी गलती करते हो। यदि अपराध अधिक गंभीर हो तो स्वयं अपने को एक समय या पुरे दिन भूखे रखें। इसी प्रकार हम स्वयं ही न्यायधीश समान गलतियों को देखते हुए दंड निर्धारित करलें और कठोरता से उसकी पालन करें। इसे प्रायश्चित कहतें हैं। इससे एक ओर तो परिवार व समाज में हमारा मान बढ़ता है वहीं दूसरी ओर आत्मसंतोष होता है, अपराध बोध से मुक्ति मिलती है और परमात्मा के दंड से छुटकारा भी होता है। तो क्यों न हम सभी अपने स्वयं की गलतियों को सुधारकर समाज को एक नया सन्देश दें।
