भारत के युवाओं से एक अपील। - एक संदेश भारत

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गुरुवार, मई 30, 2019

भारत के युवाओं से एक अपील।

(स्वामी विवेकानंद)
मेरी समस्त भावी आशा उन युवकों में केंद्रित है,जो चरित्रवान हों,बुद्धिमान हों,लोकसेवा हेतु सर्वस्वत्यागी हों और आज्ञापालक हों,जो मेरे विचारों को किर्यान्वित करने के लिए और इस प्रकार अपने तथा देश के व्यापक कल्याण के हेतु अपने प्राणों का उत्सर्ग कर सकें। यदि मुझे नचिकेता की श्रद्धा से संपन्न केवल दस से बारह युवक मिल जायें, तो मैं इस देश के विचारों और कार्यों को एक नई दिशा में मोड़ सकता हूँ। ईश्वरीय इच्छा से इन्हीं युवाओं में से कुछ समय बाद आध्यात्मिक और कर्मशक्ति के महान पुंज उदित होंगे, जो भविष्य में मेरे विचारों को क्रियान्वित करेंगे। 
         युवकों को एकत्रित और संगठित करो।  महान त्याग के द्वारा ही महान कार्य संभव है।  मेरे वीर,श्रेष्ठ,उदात्त बंधुओं।  अपने कन्धों को कार्यचक्र में लगा दो,कार्यचक्र में जुट जाओ। ठहरो मत,पीछे मत देखो, न नाम के लिए, न यश के लिए।  व्यक्तिगत अहमन्यता तो एकओर फेक दो और कार्य करो। स्मरण रखो की घांस के अनेक तिनकों को जोड़कर जो रस्सी बनती है, उससे एक हांथी को भी बांधा जा सकता है। 
   तुम सदैव शौर्य से संपन्न रहो।  केवल वीर हीं मुक्ति को सरलता पूर्वक पा सकता है, न की कायर।  कमर कसो।  वो वीरों तुम्हारे सामने शत्रु खड़ा है - यह माया-मोह की क्रूर सेना। इसमें तनिक सन्देह नहीं की समस्त महान सफलताओं के मार्ग में नाना प्रकार की बाधा भरे पड़ें हैं, किन्तु तब भी तुम अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर और अधिकतम प्रयत्न करते रहो। 
          वो वीर आत्माओ।  आगे बढ़ो,उन्हें मुक्त कराने के लिए जो जंजीरों में जकड़े हुए हैं,उनका बोझ हलका कराने के लिए जो दुःख के भार से लदे हुए हैं,उन हृदयों को आलोकित करने के लिए,जो अज्ञान की गहन तमिस्रा में डूबे हुए हैं। सुनो,वेदांत डंके की चोट पर घोषणा कर रहा है, 'अभी' (निर्भय बनो) . ईश्वर करे यह पवित्र धरती के समस्त प्राणियों के हृदयों की ग्रंथियां खोलने में समर्थ हों।                                                                              
                                                                                                                        ( स्वामी विवेकानंद )


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