संघर्ष, क्रांति और जनसरोकार के पुरोधा बाबा कामेश्वर पांडेय का निधन: मौत भी जिन्हें न डरा सकी, अंतिम शाम गांव में बांट गए खुशियां और आशीर्वाद। - एक संदेश भारत

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21 अक्टूबर 2026

संघर्ष, क्रांति और जनसरोकार के पुरोधा बाबा कामेश्वर पांडेय का निधन: मौत भी जिन्हें न डरा सकी, अंतिम शाम गांव में बांट गए खुशियां और आशीर्वाद।

फाइल फोटो : बाबा कामेश्वर पाण्डेय 


टंडवा/चतरा (बाल कृष्ण यादव) : टंडवा की माटी ने जनसंघर्ष के एक ऐसे मजबूत स्तंभ और मार्गदर्शक को खो दिया, जिसने पूरी जिंदगी अन्याय के खिलाफ कभी समझौता करना नहीं सीखा। संघर्ष, जनविश्वास और क्रांति के पर्याय माने जाने वाले बाबा कामेश्वर पांडेय—जिन्हें क्षेत्र का हर व्यक्ति सम्मान और अपनेपन से 'बाबा' पुकारता था—अब हमारे बीच नहीं रहे।

टंडवा प्रखंड के राहम गांव निवासी कामेश्वर पांडेय का पूरा जीवन विस्थापितों, मजदूरों, गरीबों और समाज के हक-अधिकार की लड़ाई को समर्पित रहा। अपने अंतिम समय में भी उन्होंने अपने उसी चिरपरिचित तेवर और सहज अंदाज के साथ विदाई ली। निधन से महज एक शाम पूर्व वे गांव में आयोजित दुर्गा पूजा के कार्यक्रम में शामिल हुए थे। वहां उन्होंने ग्रामीणों के बीच मिठाइयां बांटीं, गांव भर में घूम-घूम कर हर किसी का हाल-चाल जाना, छोटों को दुलार और बड़ों को सम्मान दिया और फिर चुपके से इस दुनिया को अलविदा कह गए।

हक की लड़ाई में न जेल से डरे, न जानलेवा हमलों से।

बाबा शुरू से ही क्रांतिकारी मिजाज के थे। 90 के दशक का दौर था, जब टंडवा प्रखंड के कल्याणपुर में कोल डंप के लिए जमीन रिपोर्ट में प्रशासनिक स्तर पर टालमटोल की जा रही थी। रैयतों की अनदेखी देख बाबा ने तत्कालीन अंचलाधिकारी (सीओ) से सीधा मोर्चा ले लिया। उस आंदोलन के प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि इस टकराव के दौरान सीओ के साथ कथित मारपीट के मामले में उन्हें दो माह जेल की सलाखों के पीछे गुजारने पड़े, मगर उनके जनसरोकार और क्रांतिकारी तेवर तनिक भी नरम नहीं पड़े।

विरोधी ताकतों ने उनके हौसलों को कुचलने के लिए कई बार जानलेवा साजिशें भी रचीं, परंतु वे उन्हें कभी डरा या डिगा न सके। राजनीतिक संघर्ष के दौरान राहम पंचायत क्षेत्र के लरंगा गांव में रांची मुख्य पथ पर स्थित सदावह नदी के पास उन पर जान से मारने की नीयत से बम फेंका गया। बम उनके शरीर से टकराया जरूर, पर फटा नहीं और वे बाल-बाल बच गए।

स्थानीय लोग बताते हैं कि उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि 90 के दशक में ही जब पुलिस ने एक मामले में उन्हें नामजद किया, तो पूरा टंडवा आक्रोशित होकर सड़कों पर उतर आया और थाने का ऐतिहासिक घेराव कर विशाल प्रदर्शन किया था।

भूख हड़ताल से झुकाया था CMPDI प्रबंधन, NTPC की स्थापना के लिए दिल्ली तक लड़ा संग्राम।

बाबा केवल आंदोलनकारी नहीं, बल्कि क्षेत्र के विकास और रोजगार के सच्चे सूत्रधार थे। राहम, दुन्दुआ एवं नईपारम के मुहाने (पाण्डेय मोड़) पर स्थित सीएमपीडीआई (CMPDI) कैंप में कार्यरत स्थानीय 11 कैजुअल मजदूरों को स्थायी नियोजन दिलाने की मांग को लेकर वे अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए थे। आखिरकार उनकी अडिग जिद के आगे सीएमपीडीआई प्रबंधन को झुकना पड़ा और सभी 11 परिवारों को स्थायी नौकरी मिली।

यही नहीं, टंडवा में एनटीपीसी (NTPC) सुपर थर्मल पावर प्लांट की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कराने के लिए बाबा ने स्थानीय स्तर से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक जोरदार प्रदर्शन किया। उनकी इसी दृढ़ इच्छाशक्ति और संघर्ष की बदौलत टंडवा में औद्योगिक विकास की मजबूत नींव पड़ी और आज यह विशाल प्लांट धरातल पर उतर सका।

झारखंड अलग राज्य आंदोलन में 'दिशोम गुरु' शिबू सोरेन के कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले बाबा के अभूतपूर्व योगदान और जेल यात्रा को सम्मान देते हुए दो माह पूर्व ही चतरा के उपायुक्त ने उन्हें विशेष प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया था।

अरगड्डा से शुरू हुआ सियासी सफर: शिबू सोरेन से यशवंत सिन्हा तक रहे करीबी।

कामेश्वर पांडेय ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 80 के दशक में, अपनी जवानी के शुरुआती दिनों में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के जमीनी सिपाही के रूप में अरगड्डा कोलियरी से की थी। झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन के वे बेहद भरोसेमंद सिपहसालारों में गिने जाते थे। झारखंड आंदोलन के दौरान सीसीएल प्रबंधन की मनमानी के खिलाफ उनके नेतृत्व में हुए उग्र आंदोलनों की गूंज पूरे कोयलांचल में सुनाई देती थी।

बाद में वर्ष 1998 में वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा के मार्गदर्शन में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया। क्षेत्र के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि वे झामुमो में बने रहते, तो आज राज्य की शीर्ष सत्ता के सबसे करीबी चेहरों में शुमार होते।

क्या आम, क्या खास—सभी के चहेते और सामाजिक समरसता की मिसाल।

क्या आम और क्या खास, बाबा हर दिल अजीज थे। छोटे-बड़े सभी का दिल से सम्मान करना, युवाओं को सही दिशा दिखाना और हर सामाजिक एवं जनसरोकार के मुद्दे पर आगे खड़े रहना उनकी दिनचर्या थी। उनकी इसी ऊर्जा और जनसेवा की भावना से नई पीढ़ी हमेशा प्रेरणा लेती रही।

कामेश्वर पांडेय के निधन से टंडवा, चतरा और पूरे कोयलांचल ने एक निडर जनआवाज और सच्चा अभिभावक खो दिया है। भले ही बाबा आज भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन टंडवा के जनआंदोलनों, मजदूरों के अधिकारों और सामाजिक भाईचारे की मिसाल के रूप में उनका संघर्ष हमेशा अमर रहेगा।

किसने क्या कहा - 

"बाबा कामेश्वर पांडेय का जाना पूरे संसदीय क्षेत्र के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वे जनसंघर्षों के सच्चे सिपाही थे, उनका जीवन निष्ठा, साहस और जनसेवा का उत्कृष्ट उदाहरण है।" — कालीचरण सिंह, सांसद, चतरा

"क्षेत्र ने आज एक निडर अभिभावक और जननायक को खो दिया है। शोषितों और वंचितों के हक के लिए जेल जाना पड़े या लाठियां खानी पड़े, बाबा कभी पीछे नहीं हटे। उनका संघर्षमय जीवन हम सभी जनप्रतिनिधियों और युवाओं के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बना रहेगा।" — उज्जवल दास, विधायक, सिमरिया 

"बाबा केवल एक नेता नहीं, बल्कि युवाओं और संघर्षशील साथियों के लिए जीवंत प्रेरणा थे। झारखंड आंदोलन से लेकर मजदूरों के हक की लड़ाई तक उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता।"— किसुन दास, पूर्व विधायक

"कल्याणपुर में कोल डंप की स्थापना और विस्थापितों के हक की रक्षा के लिए बाबा ने जो अदम्य संघर्ष किया, टंडवा की जनता उसे सदियों तक याद रखेगी। हमने अपना सच्चा साथी और रहनुमा खो दिया है।" — अक्षयवट पांडेय, पूर्व मुखिया एवं करीबी मित्र

"बाबा क्षेत्र के सच्चे अभिभावक थे। पंचायत के विकास, सामाजिक समरसता और जब भी ग्रामीणों के हक-अधिकार पर कोई आंच आई, बाबा हमेशा सबसे आगे ढाल बनकर खड़े रहे। उनका जाना पूरे पंचायत के लिए अपूरणीय क्षति है।" — विश्वजीत उरांव, मुखिया

"कामेश्वर बाबा ने विस्थापितों, मजदूरों और गरीबों के लिए जो संघर्ष दिल्ली से लेकर गांव की गलियों तक लड़ा, वह सदैव अमर रहेगा। टंडवा के औद्योगिक विकास और जनहित के मुद्दों में उनकी भूमिका को कभी भुलाया नहीं जा सकता।" — सुभाष यादव, जिला परिषद सदस्य

"बाबा केवल हमारे पंचायत के मार्गदर्शक ही नहीं, बल्कि युवाओं के लिए ऊर्जा के स्रोत थे। अपनी अंतिम शाम तक वे गांव के लोगों के बीच रहकर प्यार और आशीर्वाद बांटते रहे। उनका जाना हमारे क्षेत्र और परिवार के लिए ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं।" — विकाश कुमार पाण्डेय, पंचायत समिति सदस्य 

"कामेश्वर बाबा क्षेत्र के हर गरीब, मजदूर और शोषित वर्ग की आवाज थे। एनटीपीसी प्लांट की स्थापना से लेकर सीएमपीडीआई मजदूरों के नियोजन तक, उनका जीवन केवल जनसेवा को समर्पित रहा।" — विजय पांडेय, प्रबुद्ध नागरिक एवं समाजसेवी

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