इस्लामी आतंकवाद बनाम हिन्दू आतंकवाद। - एक संदेश भारत

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शनिवार, जून 29, 2019

इस्लामी आतंकवाद बनाम हिन्दू आतंकवाद।



भारत के मीडिया विशेषकर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की विशेषता है कि वह नित नए सनसनीखेज नारों को प्रचारित करता रहता है। इस कड़ी में नवीनतम गढ़ना है "हिन्दू आतंकवाद"। क्योंकि इस शब्द की संरचना इस्लामी आतंकवाद के संदर्भ में हुई थी अतएव इस्लामी नेतृत्व संसार भर में प्रचार करते रहे कि इस्लाम में आतंक हराम है, अतएव जो भी इस कर्म में लीन है वे इस्लामी मतावलम्बी नहीं हो सकता। भारत में मुल्लाओं की एक महासभा दारुल उलूम देवबंद के तत्त्वावधान में हुई थी जिसमें आतंकवाद की भर्त्सना की गई। देवबंद ने आतंकवाद विरुद्ध फतवा तक घोषित किया, किन्तु विश्वभर में अभी "इस्लामी आतंकवाद" शब्द का प्रयोग हो रहा है। 

"सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते।" पहले इसी विचार को प्रचारित किया गया, किन्तु बात नहीं बनती देख सेकुलर राजनेता और मीडिया ने नया फार्मूला गढ़ा - हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद। "हिन्दू आतंकवाद" शब्द गढ़ने के दो लक्ष्य थे - पहला, लोगों का मुस्लिम आतंक से ध्यान हटाना। इस हेतु एक नया नारा निर्मित हुआ: 'आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।' परिणाम अपेक्षित ही रहा। वाद-विवाद में एकाध अपवाद को छोड़कर सभी भागीदार इसी वाक्य को दोहराते रहे हैं।

किसी शब्द में ‘वाद' जोड़ने पर उस क्रिया की विचारधारा का बोध होता है। मात्र "आतंक" शब्द किसी व्यक्ति द्वारा क्षणिक आवेश में किए गए कर्म को निरूपित करता है। सो आतंक स्वयं में उस कर्म का लक्ष्य है, किन्तु "वाद" जुड़ने से किसी विचारधारा का बोध होता है, जैसे "नक्सलवादी आतंक" अथवा "माओवादी आतंक" शब्द से उन लोगों द्वारा किए गए आतंक के पीछे हिंसक मार्क्सवादी विचारधारा का होना बताता है। अतएव "नक्सलवादी आतंक" शब्द से तातपर्य यह है कि कर्म तो भय का वातावरण (आतंक) निर्माण करना है, किन्तु लक्ष्य है मार्क्सवादी राज्यव्यवस्था की स्थापना। इसी प्रकार विश्व में "इस्लामिक आतंकवाद" शब्द गढ़ा गया। यह पाश्चात्य देशों में गढ़ा और प्रचारित किया गया जहाँ इस्लाम के जेहादी गुटों ने इन देशों में आतंक मचाया।

आतंकवाद की परिभाषाओं की खोज से पता चला कि विश्व में प्रचलित परिभाषाओं में से यू.के. कानून २००० में दी गई परिभाषा सर्वमान्य है। इसके अनुसार: "आतंकवाद से अभिप्राय मजहबी भावनाओं के दुरुपयोग के द्वारा भयाक्रान्त करने वाला कर्म जहाँ, कर्म से अभिप्राय है हिंसा अथवा संपत्ति की हानि, जो राज्य या किसी वर्ग अथवा जनसमुदाय या उसके किसी विशिष्ट वर्ग के प्रति हो, तथा कर्म का लक्ष्य हो राजनीतिक, मजहबी अथवा वैचारिक परिवर्तन को बढ़ावा देना।" जिस तरह नेपाल में माओवादी आतंकवाद का लक्ष्य रहा माओवादी राज्य की स्थापना, उसी तरह इस्लामी आतंकवाद का लक्ष्य भी इस्लामी साम्राज्य अथवा शरियत का राज्य स्थापित करना है। भारत में विभिन्न मुस्लिम आतंकवादी संगठन आतंकवादी हमलों की जिम्मेदारी लेते रहे हैं। उनके द्वारा भेजे गए ई-मेल, पत्र या अन्य सन्देश उन कृत्यों को कुरान की आयतों के अनुरूप बताते हैं। शरियत का राज्य स्थापित करने के ध्येय का आधार कुरान और हदीसों में मिल जाता है। 

प्रथम - अल्लाह विश्व के निवासियों को दो वर्गों में विभाजित करता है - आस्थावान्‌ (मोमिन) और गैर-आस्थावान्‌ (काफिर और किताब वाले)। इस्लाम और पैगम्बर पर विश्वास करने वाले आस्थावान्‌ और अन्य को ‘पुस्तक वाले' और 'काफिर' दो वर्गों में रखा गया है। काफिरों से निरंतर संघर्ष / युद्ध करना आस्थावान्‌ का अनिवार्य कर्तव्य बताया गया है। दूसरा चरण उनके लिए है जो युद्ध कर नहीं सकते। उन्हें अल्लाह के मार्ग में युद्ध करने वालों की मन और धन से सहायता करनी है। जो विचारक और लेखक हों वह भाषण और लेखन से सहायक बनता है और जो युवा एवं हृष्ट-पुष्ट तथा युद्ध करने योग्य हों वह सक्रिय युद्ध / जिहाद में भाग लेना होता है। रेगिस्तानी जीवन में अनेक कमियां होती हैं। उन कमियों की पूर्ति हेतु इस अंतिम श्रेणी (जिहाद) की ओर युवाओं को आकृष्ट करने हेतु अत्यंत लुभावने प्रलोभन दिए गए हैं। युवाओं की उभरती कामवासना की पूर्ति हेतु युद्ध में पराजित समुदाय के धन, महिलाओं का अपहरण और दास-दासियाँ रखना जायज ठहराया गया है। जिहाद करते करते "शहीद" होने पर तुरंत जन्नत की गारंटी और वहाँ ७० हूरों के प्रलोभन दिया गया है। साधारण मृत्यु होने पर एक आस्थावान (मोमिन) को निर्णय के दिन (डे ऑफ जजमेंट) तक कब्र में पड़े रहना होता है, किन्तु अल्लाह के मार्ग में लड़ते लड़ते मर जाने वाले शहीद को तुरंत जन्नत का प्रावधान है अर्थात्‌ जिहाद में भाग लेकर शहीद हो जाना मात्र एक पुण्य ही नहीं है; वह जन्नत के सुख भोगने का मार्ग भी है। इस्लामी आतंक इस विचारधारा को अमली जामा पहनाता है।

इसके विपरीत हिन्दू धर्म ग्रंथों में सर्वत्र ‘वसुधैव कुटम्बकम्‌' की अवधरणा है, ‘सर्वभवन्तु सुखिनः' की कामना है। यही कारण रहा है कि पश्चिम में अफगानिस्तान से पूर्व में सुवर्ण भूमि, श्याम, कम्बोज, चम्पा, मलाया, सुमात्रा, वरुण द्वीप, एवं बाली तक फैले विस्तृत क्षेत्र में कहीं भी, कभी भी हिन्दुओं ने हमलाकर न किसी देश का अधिग्रहण किया और न ही किसी राज्य में आतंक फैलाया। हिन्दू राजे-रजवाड़े आपस में लड़ते रहे, किन्तु कभी भी किसी हिन्दू राजा ने विजित राज्य में इस्लामी हमलावरों की तरह जनता का धर्मान्तरण अथवा कत्लेआम अथवा लूटपाट करने का आदेश नहीं दिया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस्लामी हमलावरों ने जब भी ऐसा किया यो यह उनके लिए इस्लामी कर्म था। इस संदर्भ से स्पष्ट है कि आतंकवाद को इस्लाम का पोषक बनाया गया। हिन्दू दर्शन में ऐसे आतंकवाद के लिए कोई स्थान नहीं। हिन्दू शास्त्र हिन्दुओं को भयमुक्त होने हेतु अपनी पंरपरानुसार कार्य करने की राय देते है। हिन्दुओं की परंपरा के दृष्टांत महाभारत काल से लें तो वहाँ भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण के दौरान दुर्योधन के द्रौपदी को अपनी जंघा पर बैठने को कहने के अपराध में भीम ने युद्ध की रीति-नीति की अनदेखी कर उसकी जंघाओं में प्रहार कर उसका प्राणान्त किया था। कर्ण ने युद्धनीति के विपरीत अभिमन्यु को सात महारथियों के साथ घेर कर युद्ध में उसे मार गिराया तो प्रत्युत्तर में अर्जुन ने कर्ण पर उस समय प्रहार किया जब वह धसे रथ के पहिए को उठाने हेतु शस्त्रहीन था। विशेष बात यह है कि स्वयं श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्ण के दुष्कर्मों की याद दिलाई थी। सो हिन्दू परंपरा है: "सठंप्रति साठ्यम्‌ कुर्यात्‌।" दुष्टता का उत्तर उसे सहना नहीं है, अपितु उसका हनन ही है। सहना तो कायरता है। इस कर्म को हम ऊपर दी गई आतंकवाद की परिभाषा में नहीं रख सकते, क्योंकि यह विशिष्ट कर्म का अनिवार्य प्रतिशोध मात्र है। 

इस विवेचना का निष्कर्ष यह है कि इस्लामी आतंकवाद एक सत्य है: हिन्दू आतंकवाद कुत्सित भावना से गढ़ा दुष्प्रचार है।

स्रोत- आर्य समाज 
श्रधेय डाॅ० विवेक आर्य

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