आज कल के युवक-युवतिओं के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है। उन पर चारों ओर से विकारों को भड़काने वाले आक्रमण हो रहें हैं। एक तो वैसे ही अपनी पाशवी वृतियां यौन उच्छृंखलता की ओर प्रोत्साहित करती हैं। और दूसरा,सामाजिक परिस्थितयां भी उसी ओर का आकर्षण बढाती हैं। इस पर उन प्रवृत्तिओं को वैज्ञानिक समर्थन लगे और संयम को हानिकारक बताया जाने लगे..... कुछ तथाकथित आचार्य भी फ्रायड जैसे नास्तिक व अधूरे मनोवैज्ञानिक के व्यभिचारशास्त्र को आधार बनाकर "सम्भोग से समाधी" का उपदेश देने लगें ,तब तो ईस्वर हीं ब्रह्मचर्य के रक्षक हैं।
16 सितम्बर 1977 के "न्यूयार्क टाइम्स" छपा था 'अमेरिकन पैनल कहती है कि अमेरिका में अमेरिका में 2 करोड़ से अधिक लोगों को मानसिक चिकित्सा की अवश्यकता है।' इन परिणामों को देखते हुए अमेरिका एक महान लेखक संपादक व शिक्षा विशारद मार्टिन ग्रॉस अपनी। 'दी साइकोलॉजिकल सोसाइटी' पुस्तक में लिखते हैं- हम जितना समझतें हैं उससे कहीं ज्यादा फ्रायड के मानसिक रोगों ने हमारे मानस व समाज में गहरा प्रवेश पा लिया है। अब हमें फ्रायड के छाया में बिलकुल नहीं रहना चाहिए।
फ्रायड स्वयं स्पास्टिक कोलोन ,सदा रहने वाला मानसिक अवसाद ,स्नायविक रोग,सजातीय संबंध,विकृत स्वभाव,माइग्रेन,कब्ज,मृत्यु व धननाश का भय,घृणा और खुनी विचारों के दौरे, अदि रोगों से पीड़ित था। स्वयं के जीवन में संयम का नाश कर दूसरों को भी घृणित सिख देने वाला फ्रायड इतना रोगी और अशांत होकर मरा। क्या आप भी ऐसा बनना चाहते हैं ? आत्महत्या के शिकार बनना चाहते हैं ? उसके मनोविज्ञान ने विदेशी युवक-युवतिओं को रोगी बनाकर उनके सत्यानाश कर दिया।
'सम्भोग से समाधी' का प्रचार फ्रायड के रुग्ण मनोदशा का ही प्रचार है। प्रो० एडलर और प्रो० सी० जी० जुंग जैसे मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने फ्रायड के सिद्धांतों का खंडन कर दिया है। फिर भी यह खेद की बात है की भारत में अभी भी मानसिक रोग विशेषज्ञ और सायकोलॉजिस्ट फ्रायड जैसे पागल व्यक्ति के सिद्धांत का आधार लेकर देश के युवक-युवतिओं को अनैतिक और अप्राकृतिक मैथुन का, सम्भोग का सन्देश व इसका समर्थन समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के द्वारा देते रहते हैं। अब वे इस देश के लोगों को चरित्रभ्रष्ट और गुमराह करना छोड़ दें। ऐसी हमारी नम्र प्रार्थना है।
भारत के युवा आधात्म के और लौटें और भारतीय साहित्यों का अध्ययन करें इसी में सबका कल्याण है।

